Saturday, July 24, 2010

रिश्ता ...

मैं कोई कवयत्री नहीं हूँ ... बस कुछ मन में ख्याल आ जाता है तो उसे शब्दों में ढालने की कोशिश करती हूँ ... एक छोटी सी कोशिश आपके सामने हाज़िर है ...
...
मैं कोई

11 comments:

  1. आज मैं इस मुकाम पर हूँ (मेरे पास भूगर्भशास्त्र में डाक्टरेट है, विदेश में एक विदेशी कंपनी में काम कर रही हूँ) । क्या मैं इस मुकाम तक यूँ ही आ गई हूँ ? क्या इसमें मेरी कोई मेहनत नहीं है ?

    अच्छी लगी आपकी ये सोच .....!!
    शायद आपके नाम के साथ इन्द्रनिल देख किसी ने कह दिया हो ......

    रिश्तों की नज़्म अच्छी है .....बस कुछ और मेहनत चाहती है ...... !!

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  2. pahli do panktiyaan hi man le gayi..sundar prayas! keep it up :)

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  3. DHANYAWAAD CORAL JI BLOG PAR ANE AUR AUR MERA HOSLA BADHANE KE LIYE
    UMEED HAI AGE BHI MERA HOSLA BADHAYEGE..

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  4. रिश्ते को उकेरती सुन्दर रचना
    और फिर बैकग्राउंड भी उतना ही शानदार

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  5. your poem is full of feelings. Thanks for visiting my blog.

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  6. kya hoob likha aapne...badhai ho

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  7. रिश्‍ता अच्‍छा है, पर उसमें भाषा की अशुद्धियां रह गई हैं। वे रिश्‍ते को कमजोर कर रही हैं। होना चाहिए लफ्जों,उलझनें,मैं,नींव।

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  8. अच्छा लिखा है !!!!! वाह

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टिप्पणी के लिए आपका बहुत धन्यवाद. आपके विचारों का स्वागत है ...

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