Tuesday, May 17, 2011

बौद्ध धर्मसघ के ८ पथ


कई लोग बुद्ध धर्मं को सनातन हिंदू धर्म की ही एक शाख मानते हैं पर कभी इसको जानने या समझने का मौका नहीं मिला या कहिये मैंने इसमें कभी उतनी दिलचस्पी नहीं ली कारण तो बहुत से थे पर धीरे धीरे वक़्त के साथ, मेरी रूचि इस ओर बढ़ने लगी । गौतम बुद्ध के जीवन परिचय के बारे में जो भी कहानियो में सुना था इसके अलावा मेरे पास कोई खास जानकारी नहीं थी घुम्मकड स्वभाव के होने के कारण अजंता-एलोरा, कन्हेरी और धर्मशाला जैसे बौद्ध धर्म से सम्बंधित ठिकानो के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ पर वो भी केवल छात्र जीवन के दौरान कुछ कारण वश पिछले ८/१० दिनों से बुद्ध धर्मं से सम्बंधित बातों को पढ़ने का मौका मिला । और सच कहती हूँ जैसे उसमें डूब ही गयी एक के बाद एक जीवन दर्शन और शिक्षा के पन्ने खुलते गए कल जब रिमझिम को गौतम बुद्ध की जीवन-कहानी के बारे में सुना रही थी, कि कैसे वो राजकुमार सिद्धार्थ से गौतम बुद्ध बने तो लगा कि जैसे मैं भी पहली बार ही इस रूप को देख रही हूँ मैंने भी खुद में एक नया परिवर्तन महसूस किया उनके धर्मसंघ के आठ नियमों को मै जानने की कोशिश कर रही हूँ यथोचित अवलोकन (Right View) जीवन में सत्य पथ की ओर ले जाता है सच में हम हमेशा आँखें जो दिखाती है उसपर पूरा भरोसा करके चलते है पर बहुत कम लोग होते है जो आँखों से दिखाए गए चित्र को संज्ञानात्मक (cognitive) दृष्टि से देखते है

बौद्ध धर्मसघ के ८ पथ मै सक्षिप्त में दे रही हू

१. यथोचित अवलोकन (Right View)

२. परम ध्येय (Right Intension)

३. यथोचित भाषण (Right Speech)

४. यथोचित क्रियाशीलता (Right Action)

५. यथोचित आजीविका (Right livelihood)

६. यथोचित प्रयास (Right efforts)

७. यथोचित परिपूर्णता मन / सावधानी (Right Mindfulness)

८. यथोचित एकाग्रता ( Right Concentration)

Thursday, May 5, 2011

मोहसिन रिक्शावाला

हर तरफ गर्मी की छुट्टियों की तैयारियाँ चल रही है । मुझे भी अपनी बचपन के वो दिन याद आ गए जब मैं स्कूल जाती थी । वो नई नई किताबें, वो किताबों की खुशबु । वो नए नए कपड़े । और इन सब बातों में मुझे हमारा रिक्शा वाला याद आया जो हमें रोज स्कूल ले जाता था । जब हम प्रायमरी स्कूल में जाते थे तब की बात है, रामभैया नामक रिक्शावाला हमें ले जाता था । पर वो अपने बुढ़ापे के कारण और काम नहीं करना चाहता था । तब वो अपने साथ एक २०/२२ साल का दुबला पतला लड़का घर में ले आया था । वो मुसलमान था और उसका नाम था मोहसिन खान । और माँ के साथ हमारे सब दोस्तों के घर से उसे हा मिली. दूसरे दिन से सुबह सुबह मोहसिन भाई आजवाज लगते टी जल्दी चलो, पड़ोसमे विद्या रहती थी तो वि बहार आओ वो कभी भी पुरे नाम से नहीं बुलाया पूरी ये, बी, सि, डी गिनवाते थेहम लोग रिक्शे में बैठके हसते रहते थे और उसके आवाज़ के साथ हर घर के सामने एको देते रहते थे .... और फिर हमने भी उसका नाम रखा मो-भाई
हर शुक्रवार को हम सब बच्चो को वो चोकोलेते खिलाते थे उस उम्रमे समजता था नहीं था, तब हम पूछते थे आज ये चोकोलेते क्यू? तो हस देते थे .... बड़े बच्चो से कुछ मुसलमानों के बारे में पता चला तो.. हम शुक्रवार को चिढाते थे मो-भाई आज नहाये है इसलिए चोकोलेते देंगे वो कभी नाराज़ नहीं हुये बस हसी में साथ देता थे लेकिन उसका वो शुक्रवार चोकोलेते देना बंद नहीं हुआ
आज अचानक याद आया तो बहन को फोन करके पूछा तो बोली बहुत साल हो गए मो-भाई नहीं दिखे है शायद अब वो कोई और काम करते है........ क्यू? क्या बात हुयी होंगी तब बहन बोली अब लोग अपने बच्चे को शायद उसके साथ भेजना पसंद नहीं करते है. सच में दुःख हुआ कितना सादा थे वोना जादा बात करना, कितना सताते हम उन्हें पर वो हसते रहते थे। मै दो साल उनके रिक्शा में गयी कभी कोई शिकायत नहीं आई बाद में हम स्कूल में बायसिकल से जाते रहे फिर भी मो-भाई का कॉलोनी छोटे बच्चो लेजाना रोज का था मुझे याद नहीं उनके बारे में कोई शिकायत किसिस ने की
जब रामभाई उनको साथ लाए तो ना हमारी माँ ने, या दोस्तों की माँ ने... ना कहा था। आज लगता है वो दिन अलग थे तब हम हिन्दुस्तानी थे...... ना की हिंदू...... ना मुस्लिम ...आज ना जाने वो भरोसा कहा चला गया है आज हम हिंदू- मुसलमान में बट गए है ..आज आदमीसे पहले हम उसका नाम देखते है जात देखते है.....कहने को एक देश में है पर दिल टूट गए है।


चित्र गूगूल सर्च से साभार

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