Sunday, December 5, 2010

जिंदगी कि राहें ......

39 comments:

  1. दिल को छू लिया इस कविता ने!....प्रश्न बहुत गहरा है...और मन की इन भावनाओं को समझना भी बहुत मुश्किल है.

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  2. वाह ...तृप्ति जी बहुत खूब....
    बहुत ही प्यारी कविता....
    अच्छा है अपने अपनी व्यस्तता के बीच थोडा सा समय निकाला...
    यूँ ही कभी कभी कुछ लिखा करें...आप अच्छा लिखती हैं...

    पहचान कौन चित्र पहेली को अभी भी विजेता का इंतज़ार....

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  3. अनजान है वो
    इन बातों से
    की परवाने के लिए
    शमा जलती क्यों है?

    मैडम,इसका कारण एक शायर ने ये बताया है:-
    शमा ने आग रखी सर पे क़सम खाने को ,
    बाखुदा मैंने जलाया नहीं परवाने को.

    आपकी पोस्ट लगभग १ महीने बाद आई. हो सकता है इन दिनों किसी अन्य काम में व्यस्त रही हों. पढ़कर अच्छा लगा.

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  4. दिल को सुकुन देती एक सुदंर रचना।

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  5. This comment has been removed by the author.

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  6. वक़्त की धुंध में
    कहीं खो गई चाहत
    निगाहें मेरी फिर भी
    उसे ढूंढती क्यूं है?

    चाहत के साथ खोने और ढूंढने का रिश्ता पुराना है..
    एक उत्तम कविता...बधाई।

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  7. बहुत सुन्दर. मुझे तो एक फ़िल्मी गाना याद आ गया. "इंतज़ार और अभी, और अबी, और अभी"

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  8. बहुत सारे प्रश्न, उत्तर एक ... ये भवानओं की बात है।

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  9. ज़िंदगी में हर चीज़ का हिसाब नहीं होता!
    हरेक 'क्यूँ' का जवाब नहीं होता!
    आशीष
    ---
    नौकरी इज़ नौकरी!

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  10. मन को छूते सवाल.... बेहतरीन प्रस्तुति ......

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  11. itni achhi rachna aur tum ... main naam se sahi pahchaan rahi hun n?
    vatvriksh me is rachna ke saath shamil ho jaiye , intzaar hai....

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  12. बहुत ही उम्दा रचना , बधाई ।

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  13. ... bahut sundar ... behatreen ... badhaai !!!

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  14. इंतजार .. शायद यही सच है

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  15. क्या बात है..बहुत सुन्दर!!

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  16. ओके, एक कविता सिर्फ आपके लिए :

    बहुत कम बाकी है-टाला पड़ा है।
    मगर उनकी आंखों पे, जाला पड़ा है।
    सुराही पड़ी है पियाला पड़ा है
    करें क्या-जुबानों पे, ताला पड़ा है
    बहुत सुर्खरूई थी वादों में जिनके
    जो मुंह उनका देखो तो काला पड़ा है।
    कहां उठ के जाने की तैयारियां हैं
    सब असबाब बाहर निकाला पड़ा है?
    यहां पूछने वाला कोई नहीं है
    जिसे भी जहां मार डाला, पड़ा है?
    भला कोई सीना है वो भी कि जिस पर
    न बरछी पड़ी है, न भाला पड़ा है !

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  17. sundar rachna, jab shamma aur parwane bane the tabhi se ye chal raha hai.

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  18. जीवन की विडम्बनायें बड़े ही सुन्दर ढंग से चित्रित कीं।

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  19. सवाल ही सवाल हैं। जवाब भी उनमें ही हैं।

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  20. आदरणीय
    डॉ . तृप्ति जी ...नमस्कार
    आपकी कविता में जिन सवालों को उठाया गया है ...सब सवाल विचारणीय हैं ...बहुत खूब

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  21. जितनी लंबी राहें होती हैं इंतजार उससे भी लंबा हो जाता है। इस लिए इंतजार तो करना ही छोड़ दिया जी....हां राह लंबी ही है..बस कहीं कहीं यादों के सायों में सुस्ता लेते हैं हम तो वरना तो जी सफर चालू आहे...अच्छी रचना

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  22. बहुत ही उम्दा रचना , बधाई

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  23. बहुत ही सुन्दर कविता. शुभकामनाएं
    मेरे व्लाग में आने के लिए धन्यवाद.
    मेरा सवाल 156 (चित्र पहचानिए)

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  24. बहुत ही सुंदर रचना है. पथरीले रास्ते का चित्र बहुत ही सही बैठ रहा है रचना के साथ . जिन्दगी ऐसे ही पथरीले रास्तों की कड़ी है जहाँ शायद इंतजार ही है.

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  25. अच्छे भाव हैं| स्पैलिंग्स पर थोड़ा ध्यान दीजिये|

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  26. यहाँ तो सारे प्रश्न इश्क की ओर ले जाते लगते हैं।

    सुंदर अभिव्यक्ति।

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  27. जब एक बार वो अपने हो जाते हैं तो जाने अंजाने कहाँ रहते हैं ... इंतेज़ार तो होता ही है ...

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  28. आप को सपरिवार नववर्ष 2011 की हार्दिक शुभकामनाएं .

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  29. नूतन वर्ष २०११ की हार्दिक शुभकामनाएं .

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  30. बहुत अच्छा लिखती हैं आप. पथरीले रास्ते का चित्र बहुत ही सही है रचना के साथ . सुंदर लेखन, बधाई. मेरे व्लाग में आने के लिए धन्यवाद.

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  31. निसंदेह ।
    यह एक प्रसंशनीय प्रस्तुति है ।
    धन्यवाद ।
    satguru-satykikhoj.blogspot.com

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  32. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति| धन्यवाद|

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  33. आप सब को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभ कामनाएं.
    सादर
    ------
    गणतंत्र को नमन करें

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  34. बढ़िया लेखन.......आभार

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टिप्पणी के लिए आपका बहुत धन्यवाद. आपके विचारों का स्वागत है ...

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